मै पृथ्वी बोल रही हूं निबंध | पृथ्वी की आत्मकथा पर निबंध | prithvi ki aatmkatha par nibandh

हेलो दोस्तों आज के इस लेख मै पृथ्वी बोल रही हूं निबंध में हम जानेंगे पृथ्वी अपनी कहानी अपनी ही मूह जुबानी कह रही हैं। अपने बारे में हर एक चीज स्पष्ट रूप से बता रही है और हम आशा करते हैं कि पृथ्वी माता की कही बात उनकी पूर्ण कहानी को आप इस लेख पृथ्वी माता की आत्मकथा पर निबंध में अच्छे से समझेंगे और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी पृथ्वी माता की आत्मा कथा का ये निबंध बताएंगे।

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मै पृथ्वी बोल रही हूं निबंध
मै पृथ्वी बोल रही हूं निबंध

प्रस्तावना:-

हां मै पृथ्वी बोल रही हूं। पूरे सौरमंडल में मेरा आकार काफी बड़ा है। मैं अकेली ऐसे ग्रह हूं जिस पर जीवन की कामना किया जा सकता है। मेरे भूभाग पर मानव और जीव जंतु निवास करते हैं और वह मुझे माता का दर्जा देते हैं और पृथ्वी माता कह कर पुकारते हैं। मै भी सभी मनुष्यों को जीव जंतुओं को पुत्र के समान प्रेम करती हूं और उनका भरण पोषण करती हूं। मैं अपने सभी पुत्रों को देखकर खुश रहती हूं और वो हमेशा खूब रहे ऐसी कामना करती हूं।

मै किस प्रकार सबका भरण पोषण करती हूं:-

कृषि विभाग मेरे समतल और भूभाग पर अनेक प्रकार के अनाज बोते है और पेड़ पौधे लगाते हैं। ये देख कर मुझे बहुत खुशी मिलती है। मै हमेशा हरी भरी नजर आती हूं। मेरा हरा भरा रहना ही मेरी पहचान है। किसान अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए फल, सब्जियां, अनाज, आदि उगाते हैं। इस प्रकार से मै उनका भरण पोषण करती हूं।

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सभी प्राणियों का मेरे प्रति आदर और सम्मान:-

करोड़ों प्रकार के प्रजाति और जीव जंतु मेरी सतह पर मिलजुल कर रहते हैं और मेरा आदर और सम्मान करते हैं। मुझे जननी के रूप में देखते हैं। दो प्रकार के मेरे पुत्र जो मेरे भूभाग पर रहते हैं किसान जो अनाज बो कर सभी की भूख शांत करता है और दूसरा सेना के वीर जवान जो बंदूक लिए सभी की रक्षा करते हैं। ये दोनों प्रकार के पुत्र के अलावा भी काफी सारे मेरे पुत्र हैं। जो मुझसे अनंत प्रेम करते हैं और मै भी सभी को अपने पुत्र के समान मानती हूं।

मेरे भूभाग पर मतलबी लोग भी मौजूद है:-

मेरी सतह या भूभाग पर कुछ मतलबी लोग भी हैं जो अपने फायदे के लिए लोगो का नुक़सान करते हैं और मुझे भूल जाते हैं। वे लोग उर्वरकों का प्रयोग करते हैं जो मुझे पीड़ा देता है। इस तरह के लोगों के गलत कर्मों को भी मै झेल लेती हूं क्युकी मै मां हूं। जिनको लोगो को या मुझे पीड़ा देने में आनंद की अनुभूति होती है मै ऐसे लोगो को कदा भी पसंद नहीं करती हूं। दुख हर किसी के लिए पीड़ादाई होता है। जब भी मेरे पुत्रो को पीड़ा दिया जाता है तो दुख मुझे भी होता है। पर स्वार्थी लोग ना मुझे पीड़ा देना छोड़ते हैं। और ना धरती वासियों को।

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मेरा यानी की पृथ्वी माता का अनंत दुख और कष्ट:-

धरती पर बसने वाले समस्त धरती वासियों को इस बात का एहसास होना बहुत जरूरी है कि उनकी गलत करतूतों की वजह से मैं कितना कष्ट झेलती हूं। जिस प्रकार चेहरे की सुंदरता को तेजाब की एक बोतल खराब कर देती है और जला देती है उसी प्रकार जब आप अमृत तुल्य जल में गंदे और जहर के समान रासायनिक कार्बन को मिलाते हैं। तो मेरा भूभाग भी खराब होता है और जलता हैं। जोकि मेरे लिए असहनीय कष्ट है। आप मेरे पुत्र है तो आपको पता होना चाहिए कि आपकी माता को कितना कष्ट होता है।

पृथ्वी की आत्मकथा पर निबंध
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(मेरे) यानी की पृथ्वी माता के विकराल रूप का वर्णन:-

जब पृथ्वी माता को क्रोध आता है तो सभी जीव जंतुओं को और उनके पुत्रों को झेलना होता है। जब धरती माता थोड़ा सा भी हिलती है। या जब हल्की सी भी हलचल होती है। तो सभी मानव जीवन और जीव-जंतुओं पर संकट के बादल मंडराने लगते हैं। पृथ्वी माता के हिलने पर ही भूकम्प और सुनामी जैसी त्रासदी का आना स्वाभाविक हो जाता है और जब ये त्रासदी आती है तो ये केवल विनाशकारी ही साबित होती है। संपत्तियों का नुक़सान, मानव जीवन का खात्मा, और भी कई सारी तबाही होती है।

इसलिए मै हमेशा स्थिर रहने की कोशिश करती हूं। पर मुझ पर अत्याचार कर रहे लोगो की वजह से मुझे क्रोध आ जाता है और मेरा संतुलन बिगड़ जाता है। इसलिए मै हमेशा हर किसी को केवल एक संदेश देती हूं कि मुझे और मेरी बनाई हर चीज से प्रेम करो और आपका जीवन अपने आप खुशहाल बनेगा। अपनी माता को इस प्रकार कष्ट देना अच्छी बात नहीं है। उनकी बनाई हुई अनमोल चीजों से प्रेम करना सीखो।

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मुझसे आप किस प्रकार प्रेम कर सकते हैं।

1- पेड़ों को काटो मत बल्कि लगाओ। जितना ज्यादा आप पेड़ लगाओगे उतनी ही ज्यादा आपको ताज़ी ऑक्सीजन मुझसे प्राप्त होगी।

2- जल में गंदगी मत फेको उसे साफ रखो।

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3- प्रदूषण मत करो और प्रदूषण करने वालों को समझाओ की वो भी इसको ना करे।

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4- इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल मत करो एयरकंडीशनर, और हीटर जैसी चीज का उपयोग मत करो।

5- पहाड़ों को भी मात काटो।

इन सब बातो पर अमल किया तो मेरा प्रेम आपके प्रति केवल बढ़ता ही जाएगा। और आपके बेहतर भविष्य के लिए सदैव कामना करूंगी। आपको मेरे इन दो पुत्रों के समान बनना चाहिए जो मुझसे अथाह प्रेम करते हैं। एक किसान, और दूसरा सेना के सिपाही जो पूरी जिंदगी अपनी जान मेरे ऊपर न्योछावर कर देते हैं। अगर आप भी मेरी रक्षा अपनी मां मानकर करेंगे तो मै भी आपकी रक्षा पर समय करूंगी।

भारत देश के प्रति मेरा अपार प्रेम:-

वैसे तो मेरी सतह पर कई सारे देश आबाद है। परन्तु मुझे भारत देश में सबसे ज्यादा प्रेम मिलता है और मै भी भारत के निवासियों से बहुत अधिक प्रेम करती हूं। अपना प्रेम भारत के निवासी मेरी बनाई हुई अनमोल चीजो को पूजा कर प्रदर्शित करते हैं।  जैसे पेड़ो की पूजा, नदी की पूजा, पर्वत की पूजा इत्यादि। ये देख कर मुझे बहुत अधिक खुशी की अनुभूति होती हैं और मै एक मां की भांति हमेशा इनसे प्रेम करती रहूंगी।

आज के इस पृथ्वी की आत्मकथा पर निबंध में आपने जाना की पृथ्वी माता ने अपनी मूह जुबानी अपनी कहानी विस्तार में बताई है।

जब हम मै पृथ्वी बोल रही हूं निबंध लिख रहे थे तो हमारी आंखो मै आंसू आ गए थे। ये आंसू प्रेम के आंसू थे। आपको prithvi ki aatmkatha par nibandh कैसा लगा नीचे कॉमेंट कर के जरूर बताएगा। अगर अच्छा लगा हो तो इसे अपने मित्र और सगे संबंधियों के साथ भी शेयर करिएगा ताकि वह भी पृथ्वी माता की आत्मकथा पर निबंध अच्छे से जान पाए। 

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